क्या क्षेत्रीय दलों का दौर ढल रहा है?

पिछले एक दशक में भारतीय राजनीति में जो सबसे बड़ा परिवर्तन दिखाई देता है, वह केवल सत्ता परिवर्तन नहीं, बल्कि राजनीतिक भूगोल के पुनर्गठन का परिवर्तन है। 2014 में नरेंद्र मोदी के नेतृत्व में भारतीय जनता पार्टी (भाजपा) के सत्ता में आने के बाद राजनीति की दिशा, भाषा, मुद्दे और चुनावी समीकरण सभी में व्यापक बदलाव देखने को मिला। यह परिवर्तन केवल नीतिगत स्तर पर नहीं हुआ, बल्कि चुनावी विस्तार और राजनीतिक वर्चस्व के रूप में भी सामने आया।

एक समय था जब भाजपा को मुख्यतः उत्तर और पश्चिम भारत की पार्टी माना जाता था। उसका प्रभाव हिंदी पट्टी, गुजरात, महाराष्ट्र और कुछ शहरी क्षेत्रों तक सीमित समझा जाता था। लेकिन आज स्थिति भिन्न है। भाजपा ने असम और पूर्वोत्तर के अनेक राज्यों में अपनी मजबूत उपस्थिति स्थापित की है। ओडिशा में उसने बीजू जनता दल जैसी मजबूत क्षेत्रीय शक्ति को चुनौती दी और सत्ता तक पहुँच बनाई। पश्चिम बंगाल में भी उसने सत्ता हासिल की। तेलंगाना में उसका आधार बढ़ा है। दक्षिण भारत में भी वह अपनी उपस्थिति लगातार विस्तारित करने की कोशिश कर रही है।

इस विस्तार के समानांतर एक दूसरी प्रक्रिया भी चली है—कई क्षेत्रीय दलों का कमजोर होना, विभाजित होना या राजनीतिक रूप से सीमित हो जाना। शिवसेना का विभाजन, राष्ट्रवादी कांग्रेस पार्टी (एनसीपी) का टूटना, शिरोमणि अकाली दल का सिकुड़ना, बहुजन समाज पार्टी का लगातार हाशिये पर जाना, जनता दल (यूनाइटेड) की बदलती राजनीतिक स्थिति, बीजू जनता दल की चुनावी पराजय और तृणमूल कांग्रेस की बिगड़ती स्थिति—ये सभी घटनाएँ एक बड़े राजनीतिक बदलाव की ओर संकेत करती हैं।

यहीं से यह प्रश्न उठता है कि क्या भारतीय राजनीति ऐसे दौर में प्रवेश कर रही है जहाँ क्षेत्रीय दलों की भूमिका लगातार सीमित होती जा रही है?

इस प्रश्न का उत्तर सरल नहीं है। पहली दृष्टि में ऐसा प्रतीत हो सकता है कि भाजपा का राष्ट्रीय विस्तार क्षेत्रीय दलों की राजनीतिक जगह को संकुचित कर रहा है। लेकिन गहराई से देखने पर तस्वीर अधिक जटिल दिखाई देती है।

भारतीय राजनीति में क्षेत्रीय दलों का उदय कोई आकस्मिक घटना नहीं था। 1980 और 1990 के दशक में कांग्रेस के कमजोर होने के साथ-साथ विभिन्न राज्यों में क्षेत्रीय आकांक्षाएँ मजबूत हुईं। भाषा, संस्कृति, जाति, क्षेत्रीय पहचान और स्थानीय विकास के प्रश्नों ने अनेक क्षेत्रीय दलों को जन्म दिया। तमिलनाडु में द्रविड़ दल, उत्तर प्रदेश में समाजवादी और बहुजन राजनीति, बिहार में सामाजिक न्याय की राजनीति, ओडिशा में क्षेत्रीय अस्मिता, पश्चिम बंगाल में वामपंथ और बाद में तृणमूल कांग्रेस—ये सभी भारतीय संघीय लोकतंत्र की विविधता की अभिव्यक्तियाँ थीं।

1990 से 2014 तक का कालखंड वस्तुतः गठबंधन राजनीति का युग था। केंद्र की सरकारें क्षेत्रीय दलों के समर्थन पर निर्भर रहती थीं। कई बार छोटे दल राष्ट्रीय नीतियों को प्रभावित करने की स्थिति में आ जाते थे। इस दौर में राज्यों की राजनीति और केंद्र की राजनीति के बीच शक्ति का अपेक्षाकृत संतुलित वितरण दिखाई देता था।

नरेंद्र मोदी के नेतृत्व में भाजपा ने इसी राजनीतिक संरचना को चुनौती दी। भाजपा ने स्वयं को केवल एक पार्टी के रूप में नहीं, बल्कि एक अखिल भारतीय राजनीतिक परियोजना के रूप में प्रस्तुत किया। उसने राष्ट्रीय नेतृत्व, मजबूत संगठन, संसाधनों, तकनीक, सोशल मीडिया, कल्याणकारी योजनाओं और राष्ट्रवादी विमर्श को मिलाकर एक ऐसा चुनावी मॉडल विकसित किया, जिसने क्षेत्रीय दलों की पारंपरिक ताकतों को चुनौती दी।

भाजपा की सबसे बड़ी सफलता यह रही कि उसने कई राज्यों में स्थानीय चुनावों को भी राष्ट्रीय नेतृत्व के इर्द-गिर्द केंद्रित कर दिया। पहले जहाँ राज्य चुनाव मुख्यतः स्थानीय मुद्दों और क्षेत्रीय नेताओं के आधार पर लड़े जाते थे, वहीं अब अनेक राज्यों में चुनाव राष्ट्रीय नेतृत्व की लोकप्रियता से प्रभावित होते दिखाई देते हैं। इससे क्षेत्रीय दलों की विशिष्टता को चुनौती मिली।

इसके अलावा भाजपा ने सामाजिक गठबंधनों का भी पुनर्निर्माण किया। उसने उन सामाजिक समूहों तक पहुँच बनाई जो पहले क्षेत्रीय दलों के स्थायी वोट बैंक माने जाते थे। कल्याणकारी योजनाओं, प्रत्यक्ष लाभ हस्तांतरण और पहचान आधारित राजनीति के नए संयोजन ने कई राज्यों में पुराने राजनीतिक समीकरणों को बदल दिया।

भाजपा के विस्तार की व्याख्या केवल संगठनात्मक क्षमता, नेतृत्व की लोकप्रियता और चुनावी रणनीति से ही नहीं की जाती। उसके आलोचकों का तर्क है कि इस विस्तार के पीछे सत्ता और संसाधनों की अभूतपूर्व असमानता भी एक महत्वपूर्ण कारक रही है। विपक्षी दल लंबे समय से आरोप लगाते रहे हैं कि केंद्रीय जाँच एजेंसियों, संवैधानिक संस्थाओं और प्रशासनिक तंत्र का उपयोग राजनीतिक दबाव बनाने के लिए किया गया।

“ऑपरेशन लोटस” के नाम से चर्चित घटनाओं में विभिन्न राज्यों में निर्वाचित सरकारों को अस्थिर करने तथा विपक्षी विधायकों को अपने पक्ष में करने के आरोप भी बार-बार सामने आए। इसी प्रकार बड़े कॉरपोरेट घरानों, विशेषकर अंबानी और अडानी समूहों के साथ सत्ता की निकटता को लेकर भी बहस होती रही है।

आलोचकों का मानना है कि धनबल, मीडिया प्रभाव और संस्थागत शक्ति के इस संकेंद्रण ने राजनीतिक प्रतिस्पर्धा को असमान बनाया है और लोकतांत्रिक संस्थाओं की स्वायत्तता को कमजोर किया है। यद्यपि भाजपा इन आरोपों को अस्वीकार करती है और अपनी सफलता का श्रेय जनसमर्थन, विकास योजनाओं तथा संगठनात्मक दक्षता को देती है, फिर भी भारतीय लोकतंत्र में सत्ता के केंद्रीकरण और संस्थागत निष्पक्षता का प्रश्न आज एक महत्वपूर्ण राजनीतिक विमर्श बन चुका है।

इस दृष्टि से क्षेत्रीय दलों के कमजोर होने की प्रक्रिया को केवल उनकी आंतरिक कमियों या भाजपा की चुनावी दक्षता के आधार पर नहीं समझा जा सकता। यह भी देखना होगा कि क्या भारतीय राजनीति में प्रतिस्पर्धा के लिए उपलब्ध संस्थागत और आर्थिक अवसर सभी दलों के लिए समान रूप से खुले हुए हैं। यदि राजनीतिक मैदान असमान होता है, तो उसका प्रभाव स्वाभाविक रूप से क्षेत्रीय दलों की शक्ति और लोकतांत्रिक बहुलता पर पड़ता है।

फिर भी यह निष्कर्ष निकालना जल्दबाजी होगी कि क्षेत्रीय दलों का युग समाप्त हो रहा है।

भारतीय राजनीति का संघीय चरित्र अभी भी अत्यंत मजबूत है। तमिलनाडु इसका सबसे बड़ा उदाहरण है, जहाँ द्रविड़ राजनीति अब भी निर्णायक है। केरल में क्षेत्रीय नहीं तो राज्य-विशिष्ट राजनीतिक ध्रुवीकरण कायम है। तेलंगाना में भारत राष्ट्र समिति भले सत्ता से बाहर हुई हो, लेकिन उसका सामाजिक आधार समाप्त नहीं हुआ है। पश्चिम बंगाल में तृणमूल कांग्रेस अब भी एक महत्वपूर्ण शक्ति है। पंजाब में आम आदमी पार्टी और क्षेत्रीय राजनीतिक धाराएँ प्रभावशाली बनी हुई हैं।

दरअसल क्षेत्रीय दलों के सामने संकट केवल भाजपा के विस्तार का नहीं है। अनेक दल नेतृत्व के केंद्रीकरण, उत्तराधिकार की राजनीति, संगठनात्मक जड़ता और वैचारिक अस्पष्टता जैसी समस्याओं से भी जूझ रहे हैं। कई दल एक करिश्माई नेता के इर्द-गिर्द विकसित हुए थे, लेकिन नई पीढ़ी के नेतृत्व का निर्माण नहीं कर सके। कुछ दल सत्ता में लंबे समय तक रहने के कारण जनसंपर्क और संगठनात्मक ऊर्जा खो बैठे। इसलिए उनकी कमजोरी का कारण केवल भाजपा नहीं, बल्कि उनकी अपनी आंतरिक चुनौतियाँ भी हैं।

इसके साथ ही यह भी ध्यान रखना चाहिए कि भारतीय मतदाता लगातार बदल रहा है। आज मतदाता स्थानीय पहचान और राष्ट्रीय आकांक्षाओं दोनों को साथ लेकर चलता है। वह लोकसभा चुनाव में एक दल और विधानसभा चुनाव में दूसरे दल को चुन सकता है। इसलिए राष्ट्रीय स्तर पर भाजपा की मजबूती का अर्थ यह नहीं है कि राज्य स्तर पर क्षेत्रीय राजनीति अप्रासंगिक हो गई है।

भविष्य की राजनीति संभवतः पूर्णतः राष्ट्रीय या पूर्णतः क्षेत्रीय नहीं होगी, बल्कि दोनों के बीच नए संतुलन की राजनीति होगी। भाजपा का विस्तार भारतीय राजनीति को अधिक केंद्रीकृत दिशा में ले जा रहा है, जबकि क्षेत्रीय दल संघीय विविधता और स्थानीय प्रतिनिधित्व के वाहक बने हुए हैं। इन दोनों प्रवृत्तियों के बीच संघर्ष और संतुलन ही आने वाले वर्षों की राजनीति को आकार देगा।

अतः यह कहना अधिक उचित होगा कि क्षेत्रीय दलों का दौर समाप्त नहीं हो रहा, बल्कि वह एक कठिन संक्रमण काल से गुजर रहा है। कुछ दल कमजोर होंगे, कुछ समाप्त भी हो सकते हैं, लेकिन क्षेत्रीय आकांक्षाएँ और स्थानीय राजनीतिक पहचानें भारतीय लोकतंत्र की स्थायी वास्तविकताएँ हैं। जब तक भारत भाषाई, सांस्कृतिक, सामाजिक और आर्थिक विविधताओं वाला संघीय राष्ट्र बना रहेगा, तब तक क्षेत्रीय राजनीति किसी न किसी रूप में जीवित रहेगी।

वास्तविक प्रश्न यह नहीं है कि क्षेत्रीय दल बचेंगे या नहीं, बल्कि यह है कि वे बदलती राजनीतिक परिस्थितियों में स्वयं को कितना पुनर्गठित और प्रासंगिक बना पाते हैं। भारतीय राजनीति का भविष्य इसी प्रश्न के उत्तर में निहित है।

(शैलेंद्र चौहान लेखक-कवि हैं और अनियतकालिक पत्रिका धरती के संपादक हैं।)

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